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“गृहस्थ: टूटते धागे, बिखरते मोती”

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गृहस्थ जीवन: बदलते रिश्ते और भारतीय समाज की सच्चाई

भारत में परिवार का ताना-बाना हमेशा से प्रेम, विश्वास और त्याग की डोर से बुना गया था। संयुक्त परिवार प्रणाली, परंपराओं और मूल्यों पर आधारित भारतीय समाज, रिश्तों की बुनियाद पर खड़ा था। लेकिन आधुनिकता की तेज़ रफ्तार ने इस पारंपरिक संरचना को बुरी तरह प्रभावित किया है। आज के दौर में पारिवारिक रिश्तों में प्यार और अपनापन कम होता जा रहा है। विवाह जैसे पवित्र रिश्ते में भी तकरार, अहंकार, अविश्वास और आपसी समझ की कमी ने दरार डाल दी है।

आज भारतीय समाज में घरेलू कलह, तलाक और कोर्ट-कचहरी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। रिश्तों में न केवल भावनात्मक दूरी बढ़ रही है, बल्कि कई बार ये हिंसा और दुर्व्यवहार तक पहुंच जाती है। तलाक लेने वाले जोड़ों में एक आम प्रवृत्ति यह देखी जा रही है कि शादी के केवल एक या दो महीनों में ही अलग होने के लिए कोर्ट में याचिका दाखिल कर दी जाती है। जबकि कानूनन तलाक के लिए एक साल का अलगाव आवश्यक होता है, फिर भी याचिकाकर्ता इतनी जल्दी में होते हैं कि वे इंतजार तक नहीं करना चाहते। यह दर्शाता है कि मानसिक रूप से वे एक-दूसरे को अपनाने के लिए तैयार ही नहीं थे। सवाल उठता है कि क्या यह बदलाव समय की मांग है, या फिर हमने अपने पारंपरिक मूल्यों को कहीं पीछे छोड़ दिया है? इस ब्लॉग में हम आधुनिक भारतीय परिवारों की स्थिति, उनके टूटते रिश्ते और पुराने समय के आदर्श परिवारों से तुलना करके यह समझने की कोशिश करेंगे कि आखिर यह बदलाव क्यों आ रहा है।

बदलते समय के साथ बदलते रिश्ते

पहले के समय में भारतीय समाज में परिवारों को एकजुट रखने की परंपरा थी। संयुक्त परिवार प्रणाली में दादा-दादी, माता-पिता, चाचा-चाची, भाई-बहन एक साथ मिलकर रहते थे। बच्चों की परवरिश में पूरा परिवार शामिल होता था और रिश्तों में अपनापन और आत्मीयता बनी रहती थी। लेकिन आज की भाग-दौड़ भरी जिंदगी में एकल परिवार का चलन बढ़ता जा रहा है।

पहले के समय में विवाह केवल एक रिश्ते का नाम नहीं था, बल्कि यह एक आजीवन बंधन माना जाता था, जिसमें पति-पत्नी एक-दूसरे का सम्मान करते थे और हर परिस्थिति में साथ निभाने का संकल्प लेते थे। लेकिन आज विवाह महज एक सामाजिक अनुबंध बन गया है, जिसमें प्रेम और समर्पण की जगह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वार्थ ने ले ली है।

आधुनिक समाज में रिश्तों में आई गिरावट

आज के दौर में रिश्तों में कई समस्याएँ देखने को मिल रही हैं, जो इस बदलाव का मुख्य कारण हैं:

(1) विश्वास और धैर्य की कमी

विवाह और परिवार के रिश्ते विश्वास पर टिका होता है, लेकिन आज के युग में यह विश्वास कमजोर होता जा रहा है। छोटी-छोटी बातों पर लड़ाइयाँ, शक और ईर्ष्या के कारण रिश्तों में कड़वाहट बढ़ गई है। पति-पत्नी एक-दूसरे को समझने की बजाय आरोप-प्रत्यारोप में उलझ जाते हैं।

(2) अहंकार और आत्मकेंद्रित सोच

पुराने समय में लोग त्याग और समर्पण को प्राथमिकता देते थे, लेकिन आज की पीढ़ी “मेरा करियर, मेरी आज़ादी, मेरी पसंद” जैसी आत्मकेंद्रित सोच के कारण परिवार और रिश्तों को पीछे छोड़ रही है। यह स्वार्थी दृष्टिकोण अक्सर पारिवारिक कलह और तलाक का कारण बनता है।

(3) घरेलू हिंसा और विवाहेत्तर संबंध

आज घरेलू हिंसा और विवाहेत्तर संबंध बढ़ते जा रहे हैं। पहले जहाँ विवाह एक अटूट रिश्ता माना जाता था, वहीं आज विवाहेत्तर संबंधों की बढ़ती प्रवृत्ति ने विश्वास को तोड़ दिया है। सोशल मीडिया और डिजिटल युग ने इस समस्या को और बढ़ावा दिया है।

(4) आर्थिक तनाव और करियर प्रेशर

पहले के समय में परिवार की आर्थिक ज़रूरतों को मिल-जुलकर पूरा किया जाता था, लेकिन आज पति-पत्नी दोनों के करियर प्राथमिकता बन चुके हैं। अत्यधिक कार्यभार और प्रतिस्पर्धा के चलते तनाव बढ़ रहा है, जिससे रिश्तों में मधुरता की जगह कड़वाहट बढ़ रही है।

एकल परिवार की ओर बढ़ता समाज

आजकल संयुक्त परिवार का चलन धीरे-धीरे कम होता जा रहा है, और परिवार एकल परिवार में बदल रहे हैं। इस बदलाव के कई कारण हैं, जिनमें प्रमुख कारण निम्नलिखित हैं:

(1) सास-बहू के झगड़े:

घर की शांति का अंतसंयुक्त परिवार में सबसे आम समस्या सास और बहू के बीच होने वाले झगड़े हैं। पहले जहाँ सास-बहू का रिश्ता माँ-बेटी की तरह माना जाता था, आज यह रिश्ता ‘कुत्ते-बिल्ली’ जैसी लड़ाई में बदल चुका है। सास-बहू के बीच हर छोटी-बड़ी बात को लेकर झगड़े शुरू हो जाते हैं, और इसका सबसे बड़ा शिकार पति बनता है, जो “आटे की चक्की” की तरह दोनों के बीच पिसता रहता है।

(2) पत्नी द्वारा पति पर अलग रहने का दबाव

इन झगड़ों के कारण अक्सर पत्नी पति पर अपने माता-पिता से अलग होने का दबाव बनाती है। कई बार यह दबाव इतना बढ़ जाता है कि पति को परिवार छोड़कर पत्नी के साथ अलग रहना पड़ता है। इससे न केवल माता-पिता अकेले हो जाते हैं, बल्कि पारिवारिक संबंध भी कमजोर हो जाते हैं।

क्या हमें पुराने मूल्यों की ओर लौटना चाहिए?

समाज में हुए इस बदलाव को पूरी तरह नकारना भी सही नहीं होगा। आधुनिक जीवनशैली ने जहां व्यक्तियों को स्वतंत्रता दी है, वहीं रिश्तों को भी प्रभावित किया है। लेकिन यह ज़रूरी है कि हम अपने पारंपरिक मूल्यों को पूरी तरह न खो दें।

  1. आपसी संवाद बढ़ाएं: पति-पत्नी के बीच संवाद की कमी तलाक और झगड़ों की मुख्य वजह बनती है। खुलकर बातचीत करने से कई समस्याओं का हल निकल सकता है।
  2. संयुक्त परिवार की ओर लौटें: यदि संभव हो तो संयुक्त परिवार में रहना या कम से कम परिवार के बुजुर्गों से जुड़े रहना रिश्तों में स्थिरता ला सकता है।
  3. विश्वास और सम्मान को बढ़ावा दें: हर रिश्ते की नींव विश्वास पर टिकी होती है। रिश्ते में सम्मान बनाए रखना ज़रूरी है।
  4. संस्कार और संस्कृति को अपनाएँ: बच्चों को भारतीय संस्कार और पारिवारिक मूल्यों का ज्ञान देना ज़रूरी है ताकि वे भविष्य में अपने रिश्तों को संभाल सकें।

निष्कर्ष

भारतीय समाज में रिश्तों का स्वरूप बदल रहा है। पहले जहाँ प्रेम, त्याग और समर्पण रिश्तों को मजबूत बनाते थे, वहीं आज स्वार्थ, ईर्ष्या और अहंकार इन्हें तोड़ने का काम कर रहे हैं। विवाह, जो कभी अटूट बंधन हुआ करता था, अब कानूनी अनुबंध बनकर रह गया है।

यह ज़रूरी है कि हम आधुनिकता को अपनाने के साथ-साथ अपने पारंपरिक मूल्यों को भी बनाए रखें। रिश्तों को समझदारी, धैर्य और प्रेम के धागों से बुना जाए, ताकि यह मोती फिर से बिखरने से बच सकें। गृहस्थ जीवन केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि एक-दूसरे को समझने और स्वीकारने की प्रक्रिया है। हमें रिश्तों को निभाने की कला फिर से सीखनी होगी, तभी भारतीय परिवार फिर से अपनी पुरानी गरिमा को प्राप्त कर सकेंगे।

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